शनिवार, 12 नवंबर 2016

पारद विज्ञान


स्वर्ण विज्ञान अद्व्तीय और जीवन को जगमगाहट देने वाला
 विषय माना गया है. 
अनेक लेखक और गुरुदेव डॉ नारायणदत्त श्री मालीजी के अनुसार 
जितने भी प्रकार के विज्ञानों और विषयों में यह विषय सर्वश्रेठ हैं. 
क्यूंकि यदि इस विज्ञान को सही निर्देशन और सही विधि से किया जाये 
तो सम्पूर्ण जीवन को बदला जा सकता है. 
पीढियो कि दरिद्रता समाप्त हो सकती है, 
और शारीरिक दुर्बलता और अशक्त्ता को समाप्त कर 
पूर्ण यौवन व सुन्दरता प्राप्त की जा सकती है. 
इस विद्या को दो चरणों में अर्थात् धातुवाद और आयुर्वेद में 
प्रयोग कर पूर्ण सम्पन्नता और कायाकल्प दोनों प्राप्त किया जा सकता है.

पारद विज्ञान एक ऐसा विज्ञान है, 
जो सही अर्थो में गुरु के सानिध्य में और मार्गदर्शन में ही सीखा जा सकता है. हालंकि इस विषय से सम्बंधित अनेकानेक ग्रन्थ बाजार में उपलब्ध है
 किन्तु पढ़ने मात्र से प्रत्येक विधा सीखी नहीं जा सकती. 
अभी तक जितने भी ग्रन्थ इस विषय से सम्बंधित प्रकाशित हुए है, 
वे सभी या तो संस्कृत में प्रकाशित हैं या फिर इतने जटिल हैं कि 
उन्हें सही प्रकार से समझना असम्भव हैं. 
इन ग्रंथो को पढ़कर पूरी तरह से ना तो समझा जा सकता और
 ना ही प्रयोग में लाया जा सकता है.

इस विषय को सदरुरुदेव डॉ नारायणदत्त श्री मालीजी ने 
अत्यंत सरल शब्दों में समझाया एवं 
“स्वर्ण तन्त्रंम” नामक पुस्तक के माध्यम से एवं 
अनेको पत्रिकाओ में स्वर्ण बनने की विधियां और
 आयुर्वेद मैं पारद का प्रयोग स्वास्थ और सोंदर्य की 
औषधी बनाने हेतु विधियां प्रकाशित की हैं.


इसी क्रम मै  निखिल अल्केमी के माध्यम से 
श्री आरिफ निखिलजी ने इस विषय को आप सबके समक्ष
 (वर्क शॉप के माध्यम से) प्रायोगिक रूप से प्रस्तूत किया और 
इसी क्रम में उन्होंने अपने समस्त अनुभव और ज्ञान को 
एक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित करने का प्रयास किया था 
किन्तु जीवन ने ही साथ नहीं दिया.
अब निखिल परा विज्ञान शौध इकाई (प्रकाशन) 
इस कार्य को पूर्ण करने कि जिम्मेदारी लेता हैं और 
उनकी इस अद्व्तीय कृति (पुस्तक स्वर्ण रहस्यम) को 
प्रकाशित करने का एक प्रयास करता है, जो कि अति शीघ्र आप तक पहुचेगी |

रजनी निखिल
धातु विज्ञान का चमत्कार
लेखक - सुरेश सोनी

धातु विज्ञान का भारत में प्राचीन काल से व्यावहारिक जीवन में उपयोग होता रहा है।
 यजुर्वेद के एक मंत्र में निम्न उल्लेख आया है-

अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च में पर्वताश्च में सिकताश्च में 
वनस्पतयश्च मे हिरण्यं च मेऽयश्च में श्यामं च मे 
लोहं च मे सीस च में त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्‌ (कृ.यजु. ४-७-५)

मेरे पत्थर, मिट्टी, पर्वत, गिरि, बालू, वनस्पति, सुवर्ण, लोहा लाल लोहा, ताम्र, सीसा और टीन यज्ञ से बढ़ें।

रामायण, महाभारत, पुराणों, श्रुति ग्रंथों में भी सोना (सुवर्ण, हिरण्य), लोहा (स्याम), टिन (त्रपु), चांदी (रजत), सीसा, तांबा, (ताम्र), कांसा आदि का उल्लेख आता है।

धातु विज्ञान से सम्बंधित व्यवसाय करने वाले कुछ लोगों के नाम-
कर्मरा- कच्ची धातु गलाने वाले
धमत्र - भट्टी में अग्नि तीव्र करने वाले
हिरण्यक - स्वर्ण गलाने वाले
खनक - खुदाई कर धातु निकालने वाले।

चरक, सुश्रुत, नागार्जुन ने स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह, अभ्रक, पारा आदि से औषधियां बनाने की विधि का विस्तार से अपने ग्रंथों में वर्णन किया है। केवल प्राचीन ग्रंथों में ही विकसित धातु विज्ञान का उल्लेख नहीं मिलता, अपितु उसके अनेक प्रमाण आज भी उपलब्ध होते हैं। कुछ उदाहरण-

(१) जस्ता- (झ्त्दड़) धातु विज्ञान के क्षेत्र में जस्ते की खोज एक आश्चर्य है। आसवन प्रक्रिया  के द्वारा कच्चे जस्ते से शुद्ध जस्ता निकालने की प्रक्रिया निश्चय ही भारतीयों के लिए गर्व का विषय है।
राजस्थान के ‘जवर‘ क्षेत्र में खुदाई के दौरान ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में इसके निर्माण की प्रक्रिया के अवशेष मिले हैं। मात्र दस फीसदी जस्ते से पीतल सोने की तरह चमकने लगता है।
जवर क्षेत्र की खुदाई में जो पीतल की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं उनका
रासायनिक विश्लेषण करने पर पाया गया कि इनमें जस्ते की मात्रा ३४ प्रतिशत से अधिक है,
जबकि आज की ज्ञात विधियों के अनुसार सामान्य स्थिति में पीतल में २८ प्रतिशत से अधिक जस्ते का सम्मिश्रण नहीं हो पाता है।

जस्ते को पिघलाना भी एक जटिल प्रक्रिया है,
क्योंकि सामान्य दबाव में यह ९१३०से. तापक्रम पर उबलने लगता है।
जस्ते के आक्साइड या कच्चे जस्ते से शुद्ध जस्ता प्राप्त करने के लिए उसे १२०००से. तापक्रम आवश्यक है, लेकिन इतने तापक्रम पर जस्ता भाप बन जाता है।
अत: उस समय पहले जस्ते का आक्साइट बनाने के लिए कच्चे जस्ते को भूंजते थे, फिर भुंजे जस्ते को कोयला व अपेक्षित प्रमाण में नमक मिलाकर मिट्टी के मटकों में तपाया जाता था
तथा ताप १२०००से पर बनाए रखा जाता था। इस पर वह भाप बन जाता था,
 परन्तु भारतीयों ने उस समय विपरीत आसवनी नामक प्रक्रिया विकसित की थी।
 इसके प्रमाण जवर की खुदाई में मिले हैं।
इसमें कार्बन मोनोआक्साइड के वातावरण में जस्ते के आक्साइड भरे पात्रों को
उल्टे रखकर गर्म किया जाता था।
 जैसे ही जस्ता भाप बनता, ठीक नीचे रखे ठंडे स्थान पर पहुंच कर धातु रूप में आ जाता था
और इस प्रकार शुद्ध जस्ते की प्राप्ति हो जाती थी।
जस्ते को प्राप्त करने की यह विद्या भारत में ईसा के जन्म से पूर्व से प्रचलित रही।

यूरोप के लोग १७३५ तक यह मानते थे कि जस्ता एक तत्व के रूप में अलग से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यूरोप में सर्वप्रथम विलियम चैम्पियन ने जस्ता प्राप्त करने की विधि व्रिस्टल विधि के नाम से पेटेंट करवाई और यह नकल उसने भारत से की, क्योंकि तेरहवीं सदी के ग्रंथ रसरत्नसमुच्चय में जस्ता बनाने की जो विधि दी है, व्रिस्टल विधि उसी प्रकार की है।

(२) लोहा- (क्ष्द्धदृद) इतिहास में भारतीय इस्पात की श्रेष्ठता के अनेक उल्लेख मिलते हैं। अरब और फारस में लोग भारतीय इस्पात की तलवार के लिए लालायित रहते थे। अंग्रेजों ने सर्वाधिक कार्बन युक्त इस्पात को बुट्ज नाम दिया। प्रसिद्ध धातु वैज्ञानिक तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. अनंतरमन ने इस्पात बनाने की सम्पूर्ण विधि बताई है। कच्चे लोहे, लकड़ी तथा कार्बन को मिट्टी की प्यालियों में १५३५०से. ताप पर गर्म कर धीरे-धीरे २४ घण्टे में ठण्डा करने पर उच्च कार्बन युक्त इस्पात प्राप्त होता है। इस इस्पात से बनी तलवार इतनी तेज तथा मजबूत होती है कि रेशम को भी सफाई से काट देती है।

१८वीं सदी में यूरोपीय धातु विज्ञानियों ने भारतीय इस्पात बनाने का प्रयत्न किया, परन्तु असफल रहे। माइकेल फैराडे ने भी प्रयत्न किया, पर असफल रहा। कुछ ने बनाया तो उसमें वह गुणवत्ता नहीं थी।

श्री धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तक  में यूरोपीय लोगों ने जो प्रगत लौह उद्योग के प्रमाण दिए हैं, उनका उल्लेख किया है। सितम्बर, १७१५ को डा. बेंजामिन हायन ने जो रपट ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भेजी, उसमें वह उल्लेख करता है कि रामनाथ पेठ (तत्कालीन मद्रास प्रान्त में बसा) एक सुन्दर गांव है। यहां आस-पास खदानें हैं तथा ४० इस्पात की भट्टियां हैं। इन भट्टियों में इस्पात निर्माण के बाद उसकी कीमत २ रु. मन पड़ती है। अत: कम्पनी को इस दिशा में सोचना चाहिए।

दूसरी रपट मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन की है जिसमें वह सेंट्रल इंडिया में इस्पात निर्माण के बारे में लिखता है। इसमें वह जबलपुर, पन्ना, सागर आदि स्थानों की लौह खदानों का वर्णन करता है तथा
 इस्पात बनाने की प्रक्रिया के बारे में वह कहता है चारकोल सारे हिन्दुस्तान में लोहा बनाने के काम में प्रयुक्त होता है। जिस भट्टी (क़द्वद्धदठ्ठड़ड्ढ) का उल्लेख करता है, उसका निर्माण किया गया है।
उसमें सभी भाग बराबर औसत १९-२० क्द्वडत्द्य (क्द्वडत्द्य-लम्बाई मापने की प्राचीन इकाई,
लगभग १८ इंच इसका माप था) के थे। और १६ छोटी क्द्वडत्द्य के थे।
वह इस फर्नेस को बनाने की विधि का वर्णन करता है।
फर्नेस बनाने पर उसके आकार को वह नापता है तो पूरी भट्टी में वह पाता है कि एक ही प्रकार की नाप है। लम्बाई सवा ४ भाग तो चौड़ाई ३ भाग होगी और मोटाई डेढ़ भाग।
आगे वह लिखता है (१) गुडारिया (२) पचर (३) गरेरी तथा (४) अकरिया-ये उपांग इसमें लगाए जाते हैं।
बाद में जब भट्टी पूरी तरह सूख जाती है तो उसे काम में लाया जाता है।
 भट्टी के बाद धोंकनी (एथ्दृध्र्‌) उसका मुंह (ग़्दृन्न्न्न्थ्ड्ढ) बनाने की विधि, उसके बाद भट्टी से जो कच्चा लोहा निकलेगा उसे शुद्ध करने की रिफायनरी का वर्णन करता है।
फिर उससे इस्पात बनाने की प्रक्रिया तथा मात्रा का निरीक्षण उसने ३० अप्रैल, १८२७ से लेकर ६ जून, १८२७ तक किया। इस बीच ४ फरनेस से २२३५ मन इस्पात बना और इसकी विशेषता गुणवत्ता तथा विभिन्न तापमान एवं परिस्थिति में श्रेष्ठता की वह मुक्तकंठ से प्रशंसा करता है।
 उस समय एक मन की कीमत पौने बारह आना थी। सवा ३१ मन उ १ इंग्लिश टन।

मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन सागरमिंट के कप्तान प्रेसग्रेव का हवाला देते हुए कहता है कि भारत का सरिया (लोहा) श्रेष्ठ स्तर का है। उस स्वीडन के लोहे को भी वह मात देता है जो यूरोप में उस समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।

तीसरी रपट कैप्टन डे. कैम्पबेल की है जो १८४२ की है। इसमें दक्षिण भारत में लोहे के निर्माण का वर्णन है। ये सब रपट कहती हैं कि उस समय देश में हजारों छोटी-छोटी इस्पात निर्माण की भट्टियां थीं। एक भट्टी में ९ लोगों को रोजगार मिलता था तथा उत्कृष्ट प्रकार का सस्ता लोहा बनता था। वैसा दुनिया में अन्य किसी देश में संभव नहीं था। कैम्पबेल ने रेलगाड़ी में लगाने के लिए बार आयरन की खोज करते समय बार-बार कहा, यहां का (भारत का) बार आरयन उत्कृष्ट है, सस्ता है। इंग्लैण्ड का बढ़िया लोहा भी भारत के घटिया लोहे का मुकाबला नहीं कर सकता। उस समय ९० हजार लोग इन भट्टियों में काम करते थे। अंग्रेजों ने १८७४ में बंगाल आयरन कंपनी की स्थापना कर बड़े पैमाने पर उत्पादन चालू किया। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे गांव-गांव में बनने वाले इस्पात की खपत कम होती गई और उन्नीसवीं सदी के अन्त तक स्वदेशी इस्पात बनना लगभग बंद हो गया। अंग्रेजों ने बड़े कारखाने लगाकर स्वदेशी प्रौद्योगिकी की कमर तोड़ दी। इसका दु:खद पक्ष यह है कि भारतीय धातु प्रौद्योगिकी लगभग लुप्त हो गई। आज झारखंड के कुछ वनवासी परिवारों में इस तकनीक के नमूने मात्र रह गए हैं।

दिल्ली स्थित लौह स्तंभ एक चमत्कार
नई दिल्ली में कुतुबमीनार के पास लौह स्तंभ विश्व के धातु विज्ञानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। लगभग १६००० से अधिक वर्षों से यह खुले आसमान के नीचे सदियों से सभी मौसमों में अविचल खड़ा है।
 इतने वर्षों में आज तक उसमें जंग नहीं लगी, यह बात दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है।
 जहां तक इस स्तंभ के इतिहास का प्रश्न है, यह चौथी सदी में बना था।
 इस स्तम्भ पर संस्कृत में जो खुदा हुआ है, उसके अनुसार इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। चन्द्रराज द्वारा मथुरा में विष्णु पहाड़ी पर निर्मित भगवान विष्णु के मंदिर के सामने
 इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। इस पर गरुड़ स्थापित करने हेतु इसे बनाया गया होगा,
 अत: इसे गरुड़ स्तंभ भी कहते हैं। १०५० में यह स्तंभ दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल द्वारा लाया गया।
इस स्तंभ की ऊंचाई ७३५.५ से.मी. है। इसमें से ५० सेमी. नीचे है।
 ४५ से.मी. चारों ओर पत्थर का प्लेटफार्म है।
इस स्तंभ का घेरा ४१.६ से.मी. नीचे है तथा ३०.४ से.मी. ऊपर है।
इसके ऊपर गरुड़ की मूर्ति पहले कभी होगी। स्तंभ का कुल वजन ६०९६ कि.ग्रा. है।
१९६१ में इसके रासायनिक परीक्षण से पता लगा कि यह स्तंभ आश्चर्यजनक रूप से शुद्ध इस्पात का बना है तथा आज के इस्पात की तुलना में इसमें कार्बन की मात्रा काफी कम है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुख्य रसायन शास्त्री डा. बी.बी. लाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि
 इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के २०-३० किलो को टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है।
माना जाता है कि १२० कारीगरों ने पन्द्रह दिनों के परिश्रम के बाद इस स्तम्भ का निर्माण किया।
आज से सोलह सौ वर्ष पूर्व गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की उक्त तकनीक भी आश्चर्य का विषय है,
क्योंकि पूरे लौह स्तम्भ में एक भी जोड़ कहीं भी दिखाई नहीं देता।
सोलह शताब्दियों से खुले में रहने के बाद भी उसके वैसे के वैसे बने रहने (जंग न लगने) की स्थिति ने विशेषज्ञों को चकित किया है।
इसमें फास्फोरस की अधिक मात्रा व सल्फर तथा मैंगनीज कम मात्रा में है।
स्लग की अधिक मात्रा अकेले तथा सामूहिक रूप से जंग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा देते हैं।
इसके अतिरिक्त ५० से ६०० माइक्रोन मोटी (एक माइक्रोन याने १ मि.मी. का एक हजारवां हिस्सा) आक्साइड की परत भी स्तंभ को जंग से बचाती है।

(३) पारा (ग्ड्ढद्धड़द्वद्धद्धन्र्‌) यूरोप में १७वीं सदी तक पारा क्या है, यह वे जानते नहीं थे। अत: फ्र्ांस सरकार के दस्तावेजों में इसे दूसरी तरह की चांदी ‘क्विक सिल्वर‘ कहा गया, क्योंकि यह चमकदार तथा इधर-उधर घूमने वाला होता है। वहां की सरकार ने यह कानून भी बनाया था कि भारत से आने वाली जिन औषधियों में पारे का उपयोग होता है उनका उपयोग विशेषज्ञ चिकित्सक ही करें।
भारतवर्ष में लोग हजारों वर्षों से पारे को जानते ही नहीं थे अपितु इसका उपयोग औषधि विज्ञान में बड़े पैमाने पर होता था। विदेशी लेखकों में सर्वप्रथम अलबरूनी ने, जो ११वीं सदी में भारत में लम्बे समय तक रहा, अपने ग्रंथ में पारे को बनाने और उपयोग की विधि को विस्तार से लिखकर दुनिया को परिचित कराया।
 पारे को शुद्ध कर उसे उपयोगी बनाने की विधि की आगे रसायनशास्त्र सम्बंधी विचार करते समय चर्चा करेंगे। परन्तु कहा जाता है कि सन्‌ १००० में हुए नागार्जुन पारे से सोना बनाना जानते थे।
आश्चर्य की बात यह है कि स्वर्ण में परिवर्तन हेतु पारे को ही चुना, अन्य कोई धातु नहीं चुनी। आज का विज्ञान कहता है कि धातुओं का निर्माण उनके परमाणु में स्थित प्रोटॉन की संख्या के आधार पर होता है और यह आश्चर्य की बात कि पारे में ८० प्रोटॉन-इलेक्ट्रान तथा सोने में ७९ प्रोटॉन-इलेक्ट्रान होते हैं। 

(४) सोना-चांदी
 ए.डेल्मर अपनी पुस्तक  में उल्लेख करता है कि सिन्धु नदी के उद्गम स्थल पर दो त्द्मथ्ठ्ठदड्ड हैं जिनका नाम ड़ण्द्धन्र्द्मड्ढ ठ्ठदड्ड ॠढ़न्र्द्धड्ढ है और जहां स्वर्ण और रजत के कण वहां की सारी मिट्टी में प्राप्त होते हैं।
ऋग्वेद के छठे मंडल के ६१वें सूक्त का सातवां मंत्र सरस्वती और सिन्धु को हिरण्यवर्तनी कहता है।

रामायण, महाभारत, श्रीमद्‌ भागवद्‌, रघुवंश, कुमारसंभव आदि ग्रंथों में सोने व चांदी का उल्लेख मिलता है। स्वर्ण की भस्म बनाकर उसके औषधीय उपयोग की परम्परा शताब्दियों से भारत में प्रचलित रही है।

इसी प्रकार सोने, तांबे  तथा शीशे के उपयोग के संदर्भ-अथर्ववेद, रसतरंगिणी, रसायनसार, शुक्रनीति, आश्वालायन गृह्यसूत्र, मनु स्मृति में मिलते हैं। रसरत्न समुच्चय ग्रंथ में अनेक धातुओं को भस्म में बदलने की विधि तथा उनका रोगों के निदान में उपयोग विस्तार के साथ लिखा गया है।
इससे ज्ञान होता है कि धातु विज्ञान भारत में प्राचीन काल से विकसित रहा और इसका मानव कल्याण के लिए उपयोग करने के लिए विचित्र विधियां भारत में विकसित की गएं।

केरल का धातु दर्पण
डा. मुरली मनोहर जोशी केरल में पत्तनम तिट्टा जिले में आरनमुड़ा नामक स्थान पर गए
तो वहां उन्होंने पाया कि वहां के परिवारों में हाथ से धातु के दर्पण बनाने की तकनीक है।
इन हाथ के बने धातु दर्पणों को जब उन्होंने विज्ञान समिति के अपने मित्रों को दिखाया
तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ये दर्पण मशीन से नहीं अपितु हाथ से बने हैं और
सदियों से ये दर्पण भारत से निर्यात होते रहे हैं।
हम कभी अपने छात्रों को यह नहीं बताते कि हमारे यहां ऐसी तकनीक है कि अभावों में जीकर भी
परम्परागत कला लुप्त न हो जाए, इस भावना के कारण आज भी वे इसे छोड़ने को तैयार नहीं।
देश को ऐसे लोगों की चिंता करना चाहिए।

स्वर्ण बनाने का रहस्य (प्राचीन भारत की तकनीक) -
making Gold in lab

स्वर्ण बनाने का रहस्य(प्राचीन भारत की तकनीक )
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भारत के गौरव्मान इतिहास को कोन नहीं जानता,यह तो विश्व व्यापी है की भारत एक ऋषि मुनियों का देश रहा है और 
सभी क्षेत्रों जैसे विज्ञानं गणित आयुर्वेद में बहुत पहले से सभी दुसरे देशों से आगे है| 
भारत में प्राचीन काल में ऐसे बहुत सी खोज हो चुकी थी जो की बाकी देशों ने कई सदियों बाद की| 
भारत शुरू से ही सोने की चिड़िया कहलाता रहा है जिसे न जाने कितने देश सदियों तक लूटते रहे लेकिन 
फिर भी इसका खजाना खाली ना कर पाए|

भारत के सोने की चिड़िया होने और यहाँ पर सोना बनाये जाने के बारे में हो सकता है कुछ जोड़ हो|
भारत देश में सेंकडों ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनी आखों के सामने जड़ी बूटियों से पारा, ताम्बा, जस्ता, तथा
 चांदी से सोना बनते देखा है तथा आज भी देश में हजारों लोग इस रसायन क्रिया में लगे हुए हैं| 
अकेले बूंदी जिले (राज.) में ही सेंकडों लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं| 
पूर्व में बूंदी के राजा हाडा प्रतिदिन क्विन्त्लों में चांदी का दान किया करते थे 
जो की मान्यताओं के अनुसार बुन्टियों के माध्यम से ही तैयार की जाती थी|
 इस पूरी प्रक्रिया में लोग पारे को ठोस रूप में बदलने की कोशिश करते हैं तथा
 गंधक के तेल से पारे का एक एलेक्ट्रोन कम हो जाता है तथा वो गंधक पारे को पीला रंग दे देता है|
2Hg+ S = Hg2S (-2e ) ( सोना)

देश के हजारों लोग मानते हैं की देश के कॉर्पोरेट जगत के बड़े बड़े उद्योगपतियों ने इन्ही जड़ी बूटियों के माध्यम से 
तथा साधुओं के सहयोग से टनों सोना तैयार किया है|

 तेलिया कंद 

सोने के निर्माण में तेलिया कंद जड़ी बूटी का बहुत बड़ा योगदान है इसलिए पहले तेलिया कंद के बारे में जान लेते हैं|
तेलिया कंद एक चमत्कारी जड़ी बूटी है|
 देश विदेश के लोगों की रूचि को देखते हुए में तेलिया कंद के बारे में अपनी राय दे रहा हूँ|

तेलिया कंद एक चमत्कारिक पोधा है| जिसका सबसे पहला गुण परिपक्वता की स्थिति में 
जेहरीले से जेहरिले सांप से काटे हुए इंसान का जीवन बचा सकता है|
दूसरा ये पारे को सोने में बदल सकता है|

तेलिया कंद का पोधा 12 वर्ष उपरांत अपने गुण दिखता है|
 तेलिया कंद male और female 2 प्रकार का होता है|
इसके चमत्कारी गुण सिर्फ male में ही होते है|
 इसके male कंद में सुई चुभोने पर इसके तेजाबी असर से
वो गलकर निचे गिर जाती है| 
पहचान स्वरुप जबकि female जड़ी बूटी में ऐसा नहीं होता|

इसका कंद शलजम जैसा रंग आकृति लिए हुए होता है तथा
 पोधा सर्पगंधा से मिलती जुलती पत्ती जैसा होता है| 
इसका पोधा वर्षा ऋतू में फूटता है और वर्षा ऋतू ख़तम होने के बाद ख़तम हो जाता है|
जबकि इसका कंद जमीन में ही सुरक्षित रह जाता है| 
इस तरह से लगातार हर मौसम में ऐसा ही होता है|
और ऐसा 12 वर्षों में लगातार होने के बाद इसमें चमत्कारिक गुण आते हैं| 
इसके पोधे के आसपास की जमीन का क्षेत्र
तेलिय हो जाता है तथा उस क्षेत्र में आने वाले छोटे मोटे कीड़े मकोड़े उसके तेलिये असर से मर जाते हैं|

हम लोगों ने पारस पत्थर के बारे में तो सुना ही होगा| 
पारस पत्थर पारे का ठोस रूप होता है जो प्रकर्ति में गंधक के साथ मिलकर उच्च दाब और उच्च ताप की
परिस्थितिओं में बनता है| 
उसी उच्च दाब और उच्च ताप की परिस्थितिओं में तेलिया कंद पारे को ठोस रूप में बदलने में सहायक होता है|

जैसा की आयुर्वेदिक के हिसाब से पारा शिवजी का रूप है और गंधक पार्वती का रूप है| उसी तर्ज पर पारा

[hg,80] + गंधक (sulphar) ------> उत्प्रेरक ( तेलिया कंद )

तेलिया कंद
Hg + S =============> gold
उत्प्ररेक

पारे को गंधक के तेल में घोटकर उसमे तेलिया कंद मिलाकर बंद crucible में गरम करते हैं| इस क्रिया में
पारे का 1 अणु गंधक खा जाता है| गंधक पारे में अपना पीला रंग देता है| तेलिया कंद पारे को उड़ने नहीं देता
तथा पारा मजबूर होकर ठोस रूप में बदल जाता है और वो सोना बन जाता है|


ये बूटी कहाँ मिलती है| हमारे knowledge के हिसाब से ये बूटी भारत के कई जंगलों में पायी जाती है| 1982 तक भीलों का डेरा mount abu में बालू भील से देश के सभी क्षेत्र के लोग ये बूटी खरीद के ले जाते थे| 
बालू भील का देहांत हो चूका है तथा उसके बच्चे इसकी अधिक जानकारी नहीं रखते|

इस बूटी का चमत्कार करते हुए अंतिम बार बूंदी में बाबा गंगादास के आश्रम 1982 में देखा गया था| 
आज भी देश में हजारों लोग खासकर काल्बेलिये और साधू इसके चमत्कारिक गुण का उपयोग करते हैं|

तेलिया कंद की जगह देश में अन्य चमत्कारिक बूटियां भी काम में ली जाती हैं 
जैसे रुद्रबंती, अंकोल का तेल, तीन धार की हाद्जोद इतियादी|

आज के व्यज्ञानिक युग में पारे और गंधक को मिलाकर अन्य जड़ी बुटिओं को इस्तेमाल करके भी
 व्यग्यानिकों को इसपर काम करना चाहिए| 
क्यूंकि पारे का 1 एलेक्ट्रोन कम होते ही और गंधक में जाते ही वो पारा ठोस रूप में आके सोने में बदल सकता है|
 ऐसे कोई भी जडीबुटी जो पारे को गरम करने पर उड़ने से रोक सकती है और 
गंधक के तेल के साथ क्रिया करने पर पारे को सोने में बदल सकती है|

स्वर्ण-पात्र से स्वर्ण निर्माण



भारत और तिब्बत में धातु परिवर्तन अर्थात स्वर्ण निर्माण के लिए बहुत सी पद्धति का प्रचलन है . जैसे सिद्ध सूत , गंधक तेल आदि. परन्तु यह सभी ही प्रक्रियाएं बहुत ही जटिल और श्रम से परिपूर्ण हैं. और इन्हे करने में कुशलता का अनुभव जरुरी है . हाँ यह एक अलग बात है की सभी विधियां प्रमाणिक हैं और इनसे सोना बनाया जाता है.

पर इनके अलावा एक ऐसी भी क्रिया है जिससे अल्प समय में प्रचुर सोना बनाया जा सकता है.
और इस क्रिया का प्रायोगिक ज्ञान सदगुरुदेव द्वारा ही प्रकाश में आ पाया है , जो की अभी तक सिद्धों और साधू समाज के मध्य ही चलन में था वो भी गुप्त रूप से. और ऐसा होता है स्वर्ण-पात्र के द्वारा. स्वर्ण-पात्र तीन धातुओं के द्वारा बनाया गया एक कटोरे के जैसी आकृति होती है ,जिसमे कुछ पदार्थों को खरल कर अग्नि पर पात्र समेत रख कर उसमे शुद्ध पारद मिलाया जाता है और बस कुछ घंटो के बाद वो पारद चाहे कितनी भी मात्रा में हो स्वर्ण में बदल जाता है.

स्वर्ण- पात्र का निर्माण शुद्ध कंस, शुद्ध ताँबा, शुद्ध लोहे को बराबर मातृ में मिलकर किया जाता है. और इन्ही मिश्रित धातुओं से उसकी मुसली भी बनाई जाती है जिसके द्वारा उन पदार्थो का खरल किया जा सके. इस पात्र के द्वारा कई अलग अलग तरीकों से सोना बनाया जा सकता है. पात्र बनते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है की सभी धातु सुद्ध होनी चाहिए और बराबर मातृ में होना चाहिए . तभी पात्र पूर्ण प्रभाव दिखता है. और पात्र को बनाने के बाद उसे करीब १० किलो कंदों की आंच में तपा कर शुद्ध कर लेना चाहिए. इस पात्र के द्वारा हमारे एक गुरु भाई ने १९९० के पहले के शिविर में सदगुरुदेव के सामने उनके आदेश से स्वर्ण बनाने की घोषणा कित ही पर सदगुरुदेव ने ऐसे प्रदर्शन के लिए मन कर दिया था. सदगुरुदेव के मार्ग दर्शन में कई शिष्यों ने ऐसे पात्र बनाये थे . भले ही पढने में यह आसान लगता हो पर वास्तव में इस पात्र का निर्माण इतना सहज नही है क्यूंकि एक तो सामान्य भट्टियों में इतना तप्प्मान ही नही होता की वो लोहे को मेल्ट कर सके , दूसरा तीनो ही धातुओं का गलनांक भिन्न भिन्न है. मतलब जब तक लोहा गलत है तब तक तो कांसा और ताँबा गल कर उड़न छू हो जाते हैं . पर कुछ विशेष रसायनों और क्रियाओं की मदद से तीनो ही धातुओं को एक साथ सावधानी पूर्वक गलाया जा सकता है और इस पात्र को बनाकर अपने जीवन में ऐश्वर्य के रंग बिखेरते जा सकते हैं . इस पात्र की मदद से होने वाली दो गोल्ड की क्रियाएँ अल्केमी तंत्र में दी गयी है , आपकी जानकारी के लिए मैं उन्हें यहाँ पर दे रहा हूँ –




Triturate 10 tolas each of jayphal, vermilion and rasakapur to gether for three hours. Add 5 tolas of pure Samskarised mercury and trituration keep adding lemon juice drop by drop , so that a paste of the mixtureis formed. Transfer the paste into the Swarn paatr and heat it on a strong flame. When the paste starts to boil ,add 5 tolas of melted copper . the copper instantly gets converted into pure gold . wash the gold with water . the Swarn paatr can be reused several times.

Take three parts Hartaal, two parts Mansil and one part Hingul in the Swarn paatra and triturate them together thoroughly। Then add one part pue Samskarised mercury and triturate the whole mixture in juice of Gwar pathaa for 24 hours then fill the swarn paatra with water and heat iton a low flame. In about one hour all the water shall evaporate and only a ball of solid gold shall remain behind . by this method even one kg Gold can be prepared in one single attempt. This method is very simple and is considered to be the easiest process of Gold preparation . even if there have been some shortcomings in triturations , still gold is surely obtained.

कीमिया की साधना लक्ष्मी प्राप्ति की सर्वश्रेष्ठ साधना हैं जिसके परिणाम हाथो हाथ मिलते हैं . बस जरुरत है लगन से सदगुरुदेव के दिखाए गए रस्ते पर पूर्ण समर्पण के साथ चलने और म्हणत से न डरने की , और यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो दरिद्रता हमें स्वप्न में भी नही छू सकती।

आवर्त सारणी (Periodic Table) रासायनिक तत्वों को उनकी आणविक विशेषताओं के आधार पर एक सारणी (Table) के रूप में दर्शाने की एक व्यवस्था है। वर्तमान आवर्त सारणी में ११७ ज्ञात तत्व (Elements) सम्मिलित हैं। रूसी रसायन-शास्त्री मेन्देलेयेव ने करीब १४३ साल पहले अर्थात सन 1869 में आवर्त सारणी प्रस्तुत किया। उस सारणी में उसके बाद भी कई परिमार्जन भी हुए. आज उस सारणी का जो स्वरूप है उसके अनुसार ७९ वें पायदान पर सोना (गोल्ड) है तथा ८० वे पायदान पर पारद (मर्करी) है. यह सारणी तत्वों के आणविक गुणों के आधार पर तैयार की गई है. किस तत्व में कितने प्रोटोन है तथा उसका वजन (mass) कितना है आदि शुक्ष्म विश्लेषण के आधार पर १४३ वर्ष पहले यह सारणी तैयार की गई थी.

लेकिन भारत में हजारों साल पहले ग्रंथो में लिखा मिलता है की पारद से सोना बनाया जा सकता है. इस आधार पर हमें मानना होगा की हमारे ऋषियों को किसी भिन्न आयाम से तत्वो की आणविक संरचना ज्ञात थी. एसा माना जाता है की नालंदा के गुरु रसायन-शास्त्री नागार्जुन को पारद से सोने बनाने की विधी ज्ञात थी. लेकिन वह ज्ञान हमारे बीच से लुप्त हो गया है.

आधुनिक रसायन शास्त्र भी मानता है की पारद को सोने में परिवर्तित किया जा सकता है. आणविक त्वरक (Atomic Acceletor) या आणविक भट्टी (Nuclear Reactor) की मदत से पारद के अनु में से कुछ प्रोटोन घटा दिए जाए तो वह सोने में परिवर्तित हो जाएगा. यह प्रविधी महंगी है लेकिन संभव है यह आधुनिक रसायन शास्त्र भी मानता आया है.

विकसित मुलुक पारद को सोने में परिवर्तित करने की सस्ती प्रविधी पर निरंतर शोध करते आए है. क्या चीन तथा अमेरिका आदि विकसित मुलुको ने कृत्रिम रूप से सोना बनाने की सस्ती प्रविधी खोज ली है. पिछले दिनों जिस रफ़्तार से सोने के भावों में तेजी लाई गई उससे इस आशंका को बल मिलता है.

विश्व में सोने की सबसे ज्यादा खपत भारत में है. सोना अपने आप में अनुत्पादनशील निवेश है. अमेरिकी सिर्फ आभूषण के लिए सोना खरीद सकते है. अमेरिकी कानून के तहत निवेश के लिए स्थूल रूप (बिस्कुट या चक्की) के रूप में सोना रखना गैर-कानूनी है.

एक अमीर मुलुक ने सोने के निवेश पर बन्देज लगा रखा है लेकिन भारत में लोगो की सोने की भूख बढती जा रही है. लोग अपनी गाढ़ी कमाई को सोने में परिवर्तित कर रहे है. आज भारत एक ग्राम भी सोना उत्पादन नहीं करता लेकिन विश्व का सबसे बड़ा खरीददार बना हुआ है.

जिस दिन कृत्रिम स्वर्ण बनाने की प्रविधी का राज खुलेगा उस दिन सोना मिट्टी हो जाएगा. हमारी सरकार स्वर्ण पर रोक क्यों नहीं लगाती? हमारे स्वर्ण-पागलपन को ठीक करने के लिए समाज सुधारक क्यों नहीं आंदोलन करते है?

हमारे पास पूंजी के अभाव में स्कुल नहीं है, सडके नहीं है, ट्रेने नहीं है. हमारी पूंजी सोने में फंसी है. जिस दिन वह पूंजी मुक्त होगी हम फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगे.

नागार्जुन (रसायनशास्त्री)

नागार्जुन भारत के धातुकर्मी एवं रसायनज्ञ (alchemist) थे। उन्होने रसरत्नाकर नामक रसग्रंथ की रचना की।
शायद अपने समय मे किसी व्यक्ति को लेकर इतनी कहानियां नहीं गढ़ी गई थी जितनी नागार्जुन के बारे मेँ। 
कहा जाता है कि देवी-देवताओँ के साथ उनका सम्पर्क था
 जिससे उनके पास अप धातुओं को सोने में बदलने की शक्ति आ गई थी। 
और वह अमृत बना सकते थे। वह प्रसिद्ध थे और लोग उन्हें सराहना और भय मिश्रित दृष्टि से देखते थे।

परिचय

नागार्जुन का जन्म सन् ९३१ में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था। 
वह रसायनज्ञ आर्थत कीमियागर थे। लोग उनके बारे में ढ़ेर सारी कहानियां कहते थे। 
उससे उन्हें कभी व्याकुलता या परेशानी नहीं हुई थी। 
इस लोक-विश्वास को कि वह भगवान के संदेशवाहक हैं, रसरत्नाकर नामक पुस्तक लिख कर पुष्ट कर दिया।
 यह पुस्तक उनके और देवताओं के बीच बातचीत की शैली में लिखी गई थी। 
रसरत्नाकर में रस (पारे के यौगिक) बनाने के प्रयोग दिए गये हैं।
 इसमें देश में धातुकर्म और कीमियागरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था। 
इस पुस्तक में चांदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए हैं।
पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने 
पशुओं और वनस्पति तत्वों और अम्ल और खनिजों का भी इस्तेमाल किया। 
हीरे, धातु और मोती घोलने के लिए उन्होंने वनस्पति से बने तेजाबों का सुझाव दिया। 
उसमें खट्टा दलिया, पौधे और फलों के रस थे।
 उन्होंने और पहले के कीमियागरों ने जिन उपकरणों का इस्तेमाल किया था उसकी सूची भी पुस्तक में दी गई है। आसवन (डिस्टीलेशन), द्रवण(लिक्वीफेक्शन), उर्ध्वपातन (सबलीमेशन) और भूनने के बारे में भी पुस्तक मे वर्णन है। पुस्तक में विस्तारपूर्ण दिया गया है कि अन्य धातुएं सोने में कैसे बदल सकती हैं।
 यदि सोना न भी बने रसागम विशमन द्वारा ऐसी धातुएं बनाई जा सकती हैं जिनकी पीली चमक सोने जैसी ही होती थी। हिंगुल और टिन जैसे केलमाइन से पारे जैसी वस्तु बनाने का तरीका दिया गया है।
नागार्जुन ने सुश्रुत संहिता के पूरक के रूप में 'उत्तर तन्त्र' नामक पुस्तक भी लिखी। 
इसमें दवाइयां बनाने के तरीके दिये गये हैं। आयुर्वेद की एक पुस्तक `आरोग्यमञ्जरी' भी लिखी।
 उनकी अन्य पुस्तकें है- कक्षपूत तन्त्र, योगसर और योगाष्टक।

नागार्जुन

                                                                       
नागार्जुन 

                      नागार्जुन सिद्ध योगी एवं रसायनाचार्य थे। इतिहासवेत्ताओं के अनुसार नागार्जुन का जन्म दूसरी शताब्दी ईसवी में हुआ था। नागार्जुन गुजरात प्रान्त के देहक दुर्ग ( सोमनाथ के निकट) के निवासी थे। 
                   नागर्जुन का बाल्यकाल नालन्दा के बौद्ध विहार में बीता विहार के मुख्य अधिष्ठाता आचार्य राहुल भट्ट ने लम्बी आयु पाने के लिए एक मंत्र विशेष का जप करने हेतु आदेश दिया। इस मंत्र का विधिपूर्वक जप करने से नागार्जुन को दीर्घायु प्राप्त हुई। नालन्दा में नागार्जुन ने बौद्ध साहित्य तथा त्रिपिटिक का गहन अध्ययन किया, इसके पश्चात वे बौद्ध भिक्षुक बन गए।
                     नागार्जुन ने दक्षिण भारत में श्री शैल पर्वत पर एक मठ  की स्थापना की थी। इसी राह में उनके द्वारा शोध एवं अनुसंधान किये गए। अनुसंधानों से प्राप्त अनुभवों के आधार पर इन्होने कीमियागिरी पर प्रसिद्ध ग्रन्थ रसरत्नाकर की रचना की। कक्षपुटतंत्र, आरोग्यमंजरी, योगसार तथा योगशतल आदि ग्रन्थ भी इनके द्वारा रचित हैं।
रसरत्नाकर  - यह पुस्तक कीमियों से सम्बंधित है। इस पुस्तक में धात्विक यौगिकों-विशेष रूप से पारे (रस Chemical) के यौगिक बनाने एवं उनके उपयोग का वर्णन है। इसी पुस्तक में वनस्पति और धातुओं को अन्य यौगिकों में परिवर्तन की विधियों को भी बताया गया है। 
                   प्रयोगशाला में नागार्जुन ने पारे पर बहुत प्रयोग किये। विस्तार में उन्होंने पारे को शुद्ध करना और उसके औषधीय उपयोग की विधियों को बताया। अपने ग्रंथों में नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं के मिश्रण तैयार करने, पारा तथा अन्य धातुओं का शोधन करने, महारसों का शोधन तथा विभिन्न धातुओं को स्वर्ण या रजत में परिवर्तन करने की विधियों का वर्णन किया है। पारे के उपयोग से शरीर को निरोगी बनाने की विधियों को भी इसी पुस्तक में बताया गया है। पुस्तक में वर्णित विधियों का विवरण संस्कृत में सूत्र रूप में श्लोकबद्ध है। इसकी भाषा  बहुत ही गूढ़ और रहस्यमयी है, अतः इन विधियों का प्रयोग कर पाना अत्यंत दुःसाध्य है। इस ग्रन्थ में पारे के साथ ही उस समय तक ज्ञात सभी धातुओं, रस, महारस, उपरस के विवरण दिए गए हैं। यहाँ इसका आशय Chemical से है। उस समय पारद (पारा ) का उपयोग लोहसिद्धि (लोहे को सोने में परिवर्तित करना) के लिए विशेष रूप से किया जाता था। 
               इस ग्रन्थ में जस्ते के खनिज (रसक) से जस्ता निकालने की विधि का वर्णन भी दिया गया है। रसक के साथ तांबे को गलाकर पीतल बनाने की विधि का भी इसमें वर्णन है। चाँदी, तांबा, सीसा और जस्ता को पारे के साथ मिलाकर हरिताल से पीला रंग कर सोना बनाने की प्रक्रिया भी इसमें वर्णित है। नागार्जुन ने पारे के शोधन के लिए किये जाने वाली पूरी प्रक्रिया का वर्णन अपने ग्रंथों में किया है। आज के वैज्ञानिक आविष्कारों ने स्वीकार कर लिया है कि एक धातु को दूसरी धातु में बदलना संभव है। 
                  नागार्जुन ने कठोर तपस्या और सतत साधना से सिद्धि प्राप्त की थी। उन्होंने प्राणिमात्र के कल्याण हेतु धातुओं के अधिकाधिक यौगिक तैयार किये, जिनका औषधियों के रूप में प्रयोग किया गया। 
                   वैज्ञानिक नागार्जुन अपने समय के सर्वश्रेष्ठ लोक-सेवी, विलक्षण प्रतिभा एवं लग्नशीलता के धनी वैज्ञानिक थे।    

स्वर्ण बनाने का सूत्र

ये सज्जन अदालत परिसर में दुकान लगाते हैं, पकौड़ियाँ बनाने और बेचने में माहिर हैं। सज्जन हैं, सुबह से ही विजया के आनंद में मगन रहते हैं। दिन भर में पकौड़ियाँ और चाय बेच कर अपना गुजारा चलाते हैं। पिछले कुछ दिनों से इन की दुकान पर यह बैनर लगा दिखाई पड़ता है।



इस बैनर पर लिखा है -
तोरस, मोरस, गंधक, पारा
इनहीं मार इक नाग संवारा।
नाग मार नागिन को देही
सारा जग कंचन कर लेही।।

मैं तीन-चार दिनों से इस छंद को पढ़ रहा हूँ, इस का गूढ़ार्थ निकालने की कोशिशें भी कर चुका हूँ। लेकिन अभी तक असफल रहा हूँ। आखिर आज मैं ने इन्हीं सज्जन से पूछ लिया -भाई इन पंक्तियों का क्या अर्थ है। उन्होंने बताया तो मैं अवाक् रह गया। उन का कहना है कि यह सोना बनाने का सूत्र है। 
मैं ने पूछा -आप ने कोशिश की? तो उन का कहना था कि कोशिश तो की है, लेकिन हर बार कुछ न कुछ कसर रह जाती है। कभी रंग सही नहीं बैठता और कभी घनत्व सही नहीं बैठता। मैं ने और दूसरे देसी कीमियागरों को भी सोना बनाने की कोशिशें करते देखा है। लेकिन कभी किसी को सफल होते नहीं देखा। यह संभव भी नहीं है। सोना एक मूल तत्व है जिसे नहीं बनाया जा सकता। यह केवल तभी संभव है जब किसी दूसरे मूल तत्व के नाभिक और उस के आस पास चक्कर लगा रहे इलेक्ट्रोनों को बदल कर स्वर्ण प्राप्त किया जाए। लेकिन वह एक नाभिकीय प्रक्रिया है, यदि उस तरह से स्वर्ण बनाना संभव हो भी जाए तो वह प्रकृति में प्राप्त स्वर्णँ से कई सौ या हजार गुना महंगा हो सकता है।
फिर भी जिस किसी ने ये पंक्तियाँ लिखी हैं, उस के लिखने का कुछ तो लक्ष्य रहा होगा। हो सकता है वह मनुष्य से उस के अंदर का विष मार कर उसे कंचन की भाँति बन जाने की बात ही कह रहा हो? क्या कोई पाठक या ब्लागर साथी, इस का सही-सही अर्थ बता सकेगा?